मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने वकीलों और अदालती प्रक्रिया से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि अगर कोई वकील किसी केस में खुद भी आरोपी है और वह यह बात छुपाकर उसी मामले में किसी दूसरे सह-आरोपी की तरफ से कोर्ट में पेश होता है, तो इसे अदालत के साथ धोखाधड़ी या 'चीटिंग' नहीं कहा जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच ने जबलपुर की एक निचली अदालत के उस आदेश को पलट दिया है, जिसने वकील के खिलाफ कार्रवाई रोकने से इनकार कर दिया था।

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा मामला एडवोकेट सुरेश प्रसाद खरे से जुड़ा है। उनके बेटे के खिलाफ धोखाधड़ी का एक मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसमें खुद सुरेश प्रसाद खरे भी सह-आरोपी थे। खरे अपने बेटे की एफआईआर रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के सामने वकील के तौर पर पेश हुए और जिरह की। जब सिंगल बेंच को पता चला कि बहस कर रहे वकील साहब खुद इस केस में मुल्जिम हैं, तो कोर्ट ने नाराजगी जताई। अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था के साथ धोखा मानते हुए उनके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्रवाई शुरू कर दी थी।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का नियम 13 यह कहता है कि वकील को ऐसा केस नहीं लेना चाहिए जिसमें उसके गवाह होने की संभावना हो। यह नियम क्लाइंट के प्रति कर्तव्य के तहत आता है, न कि कोर्ट के प्रति कर्तव्य के तहत। इसलिए इसे अदालत से धोखाधड़ी मानकर आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता।

बार काउंसिल के नियमों का हवाला

एडवोकेट खरे ने इस कार्रवाई को डिवीजन बेंच में चुनौती दी। उनके वकील ने दलील दी कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम किसी वकील को सिर्फ तब केस लड़ने से रोकते हैं, जब उस मामले में वकील के खुद गवाह बनने की उम्मीद हो। कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है जो एक आरोपी वकील को अपने ही केस के दूसरे आरोपी की पैरवी करने से रोके। हाई कोर्ट की बेंच ने इस तर्क को सही माना और नोट किया कि स्टेट बार काउंसिल भी पहले ही वकील के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई बंद कर चुकी है।

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